गीता के ये श्लोक बताते हैं मृत्यु का सत्य. Bhagwat Geeta Saar l Shri Krishna Vani भगवत गीता उपदेश सार

 गीता के ये श्लोक बताते हैं मृत्यु का सत्य.



भगवत गीता के ये श्लोक जीवन को शांति का अनुभव कराते हैं. और मन में कोई बुरी भावना नहीं आने देते। हिन्दू धर्म में भगवत गीता को एक पवित्र ग्रंथ है। इसके श्लोक जीवन को जीने की दिशा दिखाते हैं। आइए आज भगवत गीता के श्लोक का मतलब जानते हैं. जो हमारे जीवन जीने की राह आसान कर देंगे। भगवत गीता के ये श्लोक जीवन को शांति का अनुभव कराते हैं. और मन में कोई बुरी भावना नही आने देते. तो मित्रों नमस्कार औऱ स्वागत है आप सभी का, एक बार फिर long life channel पर. Video शुरू करणेसे पहिले हम बताना चाहते हैं की. Video लास्ट तक जरूर देखे, तभी आपको मृत्यु का सत्य समज मे आयेगा. आप हमारे channel पे नये हो तो like, कमेंट औंर subscribe  जरूर करे. तो चलीये जाणते है, की मृत्यू का सत्य क्या है.

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्.

श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन, ईश्वरभक्ति में स्वयं को लीन करके, बड़े बड़े ऋषि व मुनि खुद को इस भौतिक संसार के कर्म, और फल के बंधनों से मुक्त कर लेते हैं। इस तरह उन्हें जीवन और मरण के बंधनो से भी मुक्ति मिल जाती है। ऐसे व्यक्ति ईश्वर के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं. जो समस्त दुःखों से परे है।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत.
श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन, ये आत्मा अजर अमर होती है. इसे ना तो आग से जला सकते है, और ना ही पानी भिगो सकते है. और ना ही हवा इसे सुखा सकती है, और ना ही कोई अस्त्र शस्त्र इसे काट सकता हैं।  आत्मा का विनाश कोई नही कर सकता है। और आत्मा कभी नही मर सकती हैं।


अजो अपि सन्नव्यायात्मा भूतानामिश्वरोमपि सन ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया.
श्री कृष्ण कहते हैं कि हे पार्थ, मैं एक अजन्मा तथा कभी नष्ट ना होने वाली आत्मा हूँ।  इस समस्त प्रकृति को मैं ही संचालित करता हूँ।  और इस समस्त सृष्टि का स्वामी मैं ही हूँ। और मैं योग माया से इस धरती पर प्रकट होता हूँ। तथा कोई भी मनुष्य मेरे बनाएं नियमों को तोड़ नही सकता हैं।
बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप.
श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन, हमारा केवल यही एक जन्म नहीं हुआ है। बल्कि हमारे पहले भी हजारों जन्म हो चुके हैं. तुम्हारे भी और मेरे भी, परन्तु मुझे सभी जन्मों का ज्ञान है. और तुम्हें एक ही जन्म का ज्ञान हैं। इस लिए मनुष्य जिस जन्म में पैदा होता है. उसको उसी जन्म का याद रहता है। और कूछ याद नही रहता हैं।
प्रकृतिम स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशम प्रकृतेर्वशात.

गीता के चौथे अध्याय और छठे श्लोक में, श्री कृष्ण कहते है. कि इस समस्त प्रकृति को, अपने वश में करके, यहाँ मौजूद समस्त जीवों को, में उनके कर्मों के अनुसार मैं बारम्बार रचता हूँ और जन्म देता हूँ। मैं ही उनको नया जीवन देता हुँ  अपने कर्म के अनुसार सब जीव जन्म लेते हैं। यही जीवन का सत्य हैं।
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