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भगवत गीता के अनुसार सम्भोग करना पाप है क्या ❓

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  दर्शकों, श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार, जो चीज़ मुझे चाहिए वो मेरे पास नहीं है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं, जैसे धुएँ से अग्नि और मल से दर्पण ढक जाता है। जैसे स्निग्ध झिल्ली से गर्भ ढका हुआ है, वैसे ही मनुष्य की आत्मा उसकी कामना से ढकी होती है। दर्शकों यह video बहुत ही ज्ञानवर्धक होनेवाला है, तो इसे ध्यान से और अंत तक जरूर सुने। और सच्चे दिलसे कमेंट मे जय श्री कृष्ण जरूर लिखें। दर्शकों, मनुष्य के चरित्र में कई नकारात्मक गुण होते हैं, लेकिन निसंदेह कामवासना उनमे सबसे ख़तरनाक है। ये दूसरे नकारात्मक गुणों को भी उत्पन्न करती है। जब कोई मनुष्य रजस गुण से युक्त वातावरण जैसे, अश्लील, कामुक, उत्तेजित, हिंसा युक्त वातावरण में रहता है। वैसे कार्यों को देखता है, वैसे शब्दों को सुनता है, और महसूस करता है, तो उसकी इंद्रियाँ, मन और बुद्धि उसमें, लिप्त होती जाती हैं. वो उन घटनाओं या उन पदार्थों के बारे में बार बार सोचता है। जिससे उसके मन में उनके लिए इच्छा जाग्रत होती है, यह इच्छा जब एक हद से बढ़ जाती है, तो यह वासना का रूप ले लेती है. लेकिन जब ये वासना किसी मनुष्य में लैंगिक वासना, सस्ती सामा...

हर अच्छे इंसान में होती है यह बुरी आदत, इसलिये उनका जीवन मुश्किलों से घिरा रहता है।

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दर्शकों, हर अच्छे इंसान में होती है यह बुरी आदत, इसलिये उनका जीवन मुश्किलों से घिरा रहता है। जानलो आपमें भी हैं क्या ऐसी बुरी आदत, वरना जीवन बर्बाद हो जायेगा। तो दोस्तों, video को ध्यान से और सुरु से अंत तक जरूर सुने, और सच्चे दिल से कमेंट मे जय श्री कृष्ण जरूर लिखें। दोस्तों, आपने अक्सर लोगों को ये मंतव्य देते सुना होगा, कि अच्छे लोगों के साथ कभी अच्छा नहीं होता। अच्छे लोग हमेशा दूसरों से पीछे रह जाते हैं, कभी आगे नहीं बढ़ पाते। कुछ लोग इसका कारण उनका भोला या अच्छा होना बना देते हैं। जबकि कुछ लोग इसे आध्यात्मिक नजरिये से देखते हैं, और सोचते हैं कि, बुरे लोगों के कर्मों का बाजार वो खुद पर ले लेते हैं, इसलिए उनके साथ बुरा होता है। आप क्या सोचते हैं? आपको क्या लगता है, कि अच्छे लोग जीवन में कभी आगे क्यों नहीं बढ़ पाते हैं? चलिए ढूंढते हैं इसका जवाब। दोस्तों, आपने महसूस किया होगा, कि जो लोग अच्छे होते हैं, उनमें विनम्रता तो होती है। लेकिन खुद को लेकर अहंकार भी होता है। उन्हें कहीं न कहीं ये पता होते है, कि वो बाकियों से अच्छे हैं, और इस कारण वो दूसरों को थोड़ा कमतर समझते हैं। वो खुद ही ये नि...

भाग्य को क्या माना जाये, भाग्य की लेख क्या सच में पेहेले से लिखी हुई होती है ?

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  दर्शकों, भाग्य को क्या माना जाये, भाग्य की लेख क्या सच में पेहेले से लिखी हुई होती है ? भाग्य या प्रारब्ध और कुछ नहीं, बस हमारे पिछले मनुष्य जन्म में किए गए कर्मों के फल हैं, जो समय के साथ साथ एक लड़ी के रूप में सुख या दुख के विभिन्न रूपों में हमें भोगने पड़ते हैं। किस कर्म का फल कब और कैसे भोगना होगा। यह परमेश्वर की शक्तियाँ, यानी देवताए, निष्पक्ष रूप से तय करती हैं। जहां तक मनुष्य का सम्बंध है, उसके बस में तो केवल कर्म करना ही है, कर्मफल उसके बस में नहीं होते। मनुष्य योनि में उत्पन्न हुए जीवों के द्वारा, अपने जीवनकाल में किये गए सभी शारीरिक, वाचिक एवं मानसिक कर्मों का देवताएं, यानी विभिन्न शक्तियां, प्रकृति के अचूक नियमों के अनुसार फल देती हैं। कुछ कर्मों का फल तो साथ के साथ मिल जाता है, और कुछ कर्मों का फल आने वाले जन्मों में मिलता है। हर तथाकथित अच्छे या बुरे कर्म का फल मिलता ही है। बुरे कर्म का तथाकथित बुरा फल, अच्छे कर्म के तथाकथित अच्छे फल से बेअसर नहीं होता। केवल मनुष्य योनि ही जीव की कर्म भूमि है। मनुष्य योनि भोग भूमि भी है, लेकिन अन्य योनियां तो केवल भोग भूमि ही हैं।...