भाग्य को क्या माना जाये, भाग्य की लेख क्या सच में पेहेले से लिखी हुई होती है ?
दर्शकों, भाग्य को क्या माना जाये, भाग्य की लेख क्या सच में पेहेले से लिखी हुई होती है ? भाग्य या प्रारब्ध और कुछ नहीं, बस हमारे पिछले मनुष्य जन्म में किए गए कर्मों के फल हैं, जो समय के साथ साथ एक लड़ी के रूप में सुख या दुख के विभिन्न रूपों में हमें भोगने पड़ते हैं। किस कर्म का फल कब और कैसे भोगना होगा। यह परमेश्वर की शक्तियाँ, यानी देवताए, निष्पक्ष रूप से तय करती हैं। जहां तक मनुष्य का सम्बंध है, उसके बस में तो केवल कर्म करना ही है, कर्मफल उसके बस में नहीं होते। मनुष्य योनि में उत्पन्न हुए जीवों के द्वारा, अपने जीवनकाल में किये गए सभी शारीरिक, वाचिक एवं मानसिक कर्मों का देवताएं, यानी विभिन्न शक्तियां, प्रकृति के अचूक नियमों के अनुसार फल देती हैं। कुछ कर्मों का फल तो साथ के साथ मिल जाता है, और कुछ कर्मों का फल आने वाले जन्मों में मिलता है। हर तथाकथित अच्छे या बुरे कर्म का फल मिलता ही है। बुरे कर्म का तथाकथित बुरा फल, अच्छे कर्म के तथाकथित अच्छे फल से बेअसर नहीं होता। केवल मनुष्य योनि ही जीव की कर्म भूमि है। मनुष्य योनि भोग भूमि भी है, लेकिन अन्य योनियां तो केवल भोग भूमि ही हैं। जहाँ जीव अपने पिछली मनुष्य योनि में किये गए, तथाकथित अच्छे और बुरे कर्मों का फल सुख और दुख के रूप में भोगता है। इन योनियों में जीव के नए कर्म नहीं जुड़ते, केवल पिछले कर्म घटते हैं। जब तक जीव अपने सभी तथाकथित अच्छे और बुरे कर्मों के फलों से शून्य नहीं हो जाता, उसका विभिन्न योनियों में आना जाना लगा रहता है। जीव हर बार जब अन्य योनियों में अपने कर्मों के फल भोगने के पश्चात्, मनुष्य योनि में आता है। तो उसके साथ उसके बचे हुए कर्मों के फल प्रारब्ध रूप में आते हैं। प्रारब्ध के अनुसार ही उसे साधारण, मध्यम या उच्च स्तरीय परिवार, परिजन एवं सामाजिक वातावरण मिलता है, और उसके जीवन में कभी सुखदायी तो कभी दुखदायी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। इन परिस्थितियों को यदि वह अपने बुद्धि और विवेक से अपने अनुकूल बनाने में कामयाब हो जाता है, तो इसे ही अपने कर्मों के द्वारा प्रारब्ध को बदलना या सुधारना कह सकते हैं। परंतु इस प्रक्रिया में वह अक्सर अज्ञानतावश फिर से नए कर्म फलों को जोड़ कर, नये प्रारब्ध को भोगने का पात्र बन जाता है। और इस प्रकार वह योनियों के चक्र से बाहर नहीं निकल पाता। अब प्रश्न यह उठता है कि, मनुष्य जब कर्म करेगा तो, उसे उनके फल भी भोगने होंगे। तो वह कर्मफल शून्य कैसे हो, और कैसे वह इन योनियों के चक्र से छूटे? इस संदर्भ में धर्म पंथ कहता है, कि यदि मनुष्य ईश्वर के कहे वचनों के अनुसार, जीवन व्यापन करे तो, उसे उसके द्वारा किये गए कर्मों के फल नहीं भोगने पड़ेंगे। ईश्वर के वचन सामान्य जीवन जीने के लिए बाधक नहीं हैं। ये वचन मुख्यतः यह कहते हैं, कि हम जो कुछ भी करें, इस बात का ख़याल रखें, कि हम कोई भी क्रिया करते हुए, किसी भी प्राणी के शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक दुख का कारण न बनें। इसके अतिरिक्त जो परमेश्वर के वचन हैं, वे हमसे कोई असामान्य हठ, यौगिक कठिन कार्य करने को नहीं कहते। वे केवल हमसे अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए, और अपने स्वधर्म को निभाते हुए विकृति रहित स्वस्थ जीवन जीने के लिए कहते हैं। स्वधर्म अर्थात् अपने परिवार, अपने समाज और मानवता के प्रति हमारे कर्तव्य। हमारे इस उपक्रम के लिए, परमेश्वर हम तक आवश्यक ज्ञान पहुँचाने का कोई न कोई निम्मित बना देते है। परमेश्वर को हमसे कुछ नहीं चाहिए। बस हमें ही इस अमूल्य मनुष्य जन्म को सार्थक करने की आवश्यकता है। अपने जीवन को निष्काम होकर जीते हुए, पाप पुण्य रहित बना कर। तो दोस्तों उम्मिद करता हू की, आपको video पसंद आया होगा। और आप हमारे channel पर नये हो तो, video को like, और channel को subscribe जरूर करे। आपके एक लाईक से ही हमे प्रेरणा मिलती है, और हम मोटिवेट होते है। धन्यवाद।

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