यमराज कहते है- पत्नी के आलावा इस स्रि के साथ संबंध रखना पाप नहीं होता है।



 नमस्कार प्रिय दर्शकों, धर्म रक्षा channel पर आप सभी का तहे दिल से स्वागत है। दोस्तों, पत्नी के अलावा इस एक स्त्री से संबंध रखना पाप नहीं होता है। शास्त्रों के अनुसार कोई भी पुरुष पत्नी के अलावा इस एक स्त्री से शारीरिक संबंध बना सकता है। दर्शकों, video को पूरा सुनो तभी कमेंट मे कुछ लिखना है तो लिखो, आधा ज्ञान कुछ काम का नहीं होता है। तो दर्शकों, मेरी एक विनंती है, की video को ध्यान से और अंत तक जरूर सुनो, और सच्चे दिल से कमेंट मे जय श्री कृष्ण जरूर लिखें। और भी जानकारी के लिए हमारे इंस्टाग्राम, whatsapp channel को फ्री मे जुड सकते है, उसकी Link description मे दी है। दर्शकों, एक बार देवर्षि नारद नारायण नारायण का जाप करते हुए, अंतरिक्ष के मार्ग से यमलोक पहुँच जाते हैं। यमलोक के देवता यमराज विशालकाय सिंहासन पर विराजमान होते हैं, उनके पास चित्रगुप्त बैठे हुए होते हैं। तभी देवर्षि नारद उस स्थान पर पहुंच जाते हैं। देवर्षि नारद को आता देख कर, यमराज उनका स्वागत करते हैं, और उन्हें प्रणाम करते हुए कहने लगते हैं, आपके आगमन से यमपुरी धन्य हुई है। देवर्षि नारद कहते हैं, हे मृत्यु और न्याय के देवता यमराज, आपको प्रणाम है। आज बड़े युगों के बाद आप यमपुरी पधारे हैं, अवश्य ही कोई महत्वपूर्ण कारण होगा। कृपया आप हमें बताने की कृपा करें, कि आप किस प्रयोजन से आज यमपुरी आए हैं। तब नारद जी कहते हैं, हे धर्मराज, आप मृत्यु और न्याय के देवता हैं, तीनों लोकों के प्राणियों को उनके कर्म के अनुसार दंड देने का कार्य आप करते हैं। आपके पास समस्त प्राणियों और चराचर का लेखा जोखा रखा हुआ है। पापी मनुष्यों को आप नरक में डालते हैं, और पुण्यवान मनुष्य को आप स्वर्ग में भेजते हैं। इसीलिए आपको मनुष्यों के सभी पाप और पुण्य कर्मों का ज्ञान है। मैं आपके पास एक विचित्र प्रश्न लेकर आया हूँ, कृपया आप मेरे इस प्रश्न का उत्तर दे। फिर यमराज कहते हैं, हे देवर्षी आप सत्य कहते हैं, हमारे पास तीनों लोकों के प्राणियों का लेखा जोखा रखा हुआ है। क्योंकि प्रभु ने हमें यही कार्य सौंपा है, हम प्रभु के आदेश से ही मनुष्य के पाप और पुण्य कर्मों के आधार पर उन्हें दंड देते हैं। आपके मन में जो भी प्रश्न अथवा शंका है, आप निसंकोच होकर पूछिए। हम अपने सामर्थ्य के अनुसार, उनका समाधान अवश्य करने का प्रयास करेंगे। तब देवर्षि कहते हैं, हे यमराज, शास्त्र कहते हैं, कि एक पुरुष को केवल एक ही स्त्री से विवाह करना चाहिए। एक ही स्त्री से संबंध बनाना चाहिए। किन्तु मैंने यह भी देखा है, कि कुछ मनुष्य अनेक विवाह करते हैं, अनेक स्त्रियों से संबंध रखते हैं। क्या यह पाप नहीं है, क्या ऐसे मनुष्यों को नरक में डाला जाता है। इस पर शास्त्र क्या कहते हैं, क्या कोई मनुष्य अनेक स्त्रियों से विवाह कर सकता है। कृपया आप मेरी शंका को दूर करें। यमराज कहने लगते हैं, देवर्षि आपने समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए, उचित ही प्रश्न किया है। संसार में मनुष्य एक से अधिक विवाह कर सकता है या नहीं, इसका उत्तर देने से पूर्व, मैं आपको एक कथा सुनाता हूँ। इस महान कथा में आपको सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे। इसीलिए आप इस कथा को ध्यान से जरूर सुनें, जो भी इस कथा को ध्यान से सुनता है, मैं उसके बत्तीस अपराध माफ करता हु। फिर नारद जी कहते हैं, हे धर्मराज आप उस कथा को अवश्य कर लें, मैं उसे ध्यान से पूरा सुनूंगा। तब यमराज नारद जी को वह महान कथा सुनाते हैं, प्राचीन काल की बात है, मध्य देश में एक अत्यंत शोभायमान नगरी थी। उस नगरी के एक अत्यंत गुणवान बलवान, और रूपवान राजा थे, जिनका नाम था धर्मपाल। महाराज धर्मपाल एक न्यायप्रिय राजा थे, उनकी प्रजा उनके न्याय से अत्यंत संतुष्ट रहा करती थी। राजा भी अपनी प्रजा का अच्छी तरह से देखभाल करते थे। प्रजा का सभी जरूरतों का अच्छी तरह से ध्यान रखते थे। महाराज की सुकन्या नाम की पत्नी थी, जो अत्यंत सुंदर, गुणवान चरित्रवान, और पतिव्रता नारी थी। महाराज धर्मपाल और रानी सुकन्या बहुत ही दयालु स्वभाव के थे। वे हर प्रकार के यज्ञ, दान धर्म तथा अनुष्ठान किया करते थे। उनके साम्राज्य में सब कुछ था, किन्तु केवल एक कारण से महाराज महारानी और प्रजा दुखी रहते थे। महाराज को कोई संतान नहीं थी, जिससे महाराज दुखी और चिंता में रहते थे। प्रजा को भी महाराज की ऐसी दशा देखी नहीं जा रही थी, कितने ही प्रयास करने पर भी, महाराज को कोई संतान नहीं हो रही थी। महाराज ने अनेक वैद्य बुलाए, अनेक पुत्र प्राप्ति के उपाय किए, दान धर्म किया, व्रत किए, किन्तु उन्हें किसी भी उपाय से संतुष्टि नहीं मिली। फिर एक दिन प्रजाजन महाराज के पास आते हैं, और कहते हैं, हे महाराज आप पुत्र प्राप्ति के लिए दूसरा विवाह करें। किन्तु महाराज अपनी प्रजा की बात से सहमत नहीं होते हैं। महाराज रानी सुकन्या से बहुत प्रेम करते थे, इसीलिए वे अपनी पत्नी का दिल नहीं दुखाना चाहते थे। तथा महाराज शास्त्रों का भी ज्ञान रखते थे, कि एक पुरुष को केवल एक ही स्त्री के प्रति एकनिष्ठ रहना चाहिए। एक पत्नी के होते हुए, कभी दूसरी स्त्री के पास नहीं जाना चाहिए। जिस प्रकार से एक मादा पशु के साथ, दो नर पशु नहीं रह सकते। ठीक उसी प्रकार से, एक पुरुष के साथ दो स्त्रियां कभी सुखी नहीं रह सकते हैं। जो पुरुष एक पत्नी होते हुए भी, दूसरी स्त्री से संबंध रखता है, वह घोर पाप करता है, और नरक में ही गिरता है। इसी कारण से महाराज दूसरा विवाह नहीं करना चाहते थे। फिर प्रजाजन महारानी के पास जाकर, उनसे आग्रह करते हैं, कि वे महाराज को दूसरा विवाह करने के लिए मनाएं। तब रानी सुकन्या भी प्रजा के दुख समझती है, और महाराज के पास आकर कहने लगती है। हे स्वामी, आप कृपया दूसरा विवाह कर लीजिए। हमारे राज्य को भविष्य में एक राजा की आवश्यकता पड सकती है। फिर महाराज रानी को भी मना करते हैं। और कहते हैं, प्रिय यदि में दूसरा विवाह भी कर लूंगा, तो मैं पाप का भागी बन जाऊंगा, मुझे नरक में ही जाना पडेगा। और तुम बताओ क्या तुम मेरे दूसरे विवाह से खुश रह पाओगी। तब रानी कहती है, हे स्वामी आपकी खुशी में ही मेरी खुशी है, मैं मेरी सौतन को अपनी बहन मानकर प्यार दूंगी। कृपया आप संकोच न करें, मुझे इससे क्षण मात्र भी दुख नहीं होगा। मैं आपको विवाह के लिए सहमति देती हु। तब महाराज कहते हैं, हे देवी, किन्तु मुझे उस पाप से कौन बचाएगा, जो एक स्त्री के होते हुए भी, दूसरी स्त्री के साथ संबंध रखने से मिलता है, इस पाप से कोई मुक्ति नहीं है। मैं ऐसा घोर अनर्थ नहीं करना चाहता, उधर स्वर्ग लोक से महाराज के सभी पूर्वज इस घटनाक्रम को देख रहे होते हैं। वे अपने पुत्र के ऐसे व्यवहार से अत्यंत दुखी हो जाते हैं। यदि महाराज को पुत्र नहीं होगा तो, कुल का विनाश हो जाएगा, इसी भय से सभी पूर्वज बहुत दुखी हो जाते हैं। फिर एक दिन सभी पूर्वज महाराज के सपने में आकर, उन्हें दर्शन देते हैं, और कहते हैं, हे पुत्र, तुम्हारे कारण हमारी दुर्गति हो रही है, हमारे कुल का विनाश हो रहा है।

 तब महाराज अपने पूर्वजों से कहते हैं, हे महात्माओं, मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है, जो आप सभी इतने दुखी हुए हैं। आपकी आत्मा की शांति के लिए जो भी उपाय हो, मै अवश्य ही करूंगा। तभी वे पूर्वज कहने लगते हैं, हे पुत्र, हमारी मुक्ति का एक ही उपाय है, वह है तुम्हारी सन्तान। यदि तुम पुत्र को जन्म नहीं दोगे, तो तुम्हारे साथ साथ हमें भी नरक में जाना पडेगा। हमारा संपूर्ण कुल और वंश नष्ट हो जाएगा। इसीलिए ही पुत्र हम तुमसे विनती करते है, कि तुम दूसरा विवाह करो। पुत्र के बिना मनुष्य को सद्गति प्राप्त नहीं होती है, पुत्र ही अपने माता पिता का उद्धार करता है, उन्हें मोक्ष दिलाता है। जब वह श्राद्ध करता है तो, हमारे पाप नष्ट हो जाते हैं। जब वह पृथ्वी लोक पर दान धर्म करता है, तो हमें स्वर्ग लोक में भोजन की प्राप्ति होती है। इसीलिए हे पुत्र, तुम शीघ्र ही पुत्र की प्राप्ति के लिए कोई उपाय करो। अपने पितरों की बात सुनकर भी महाराज दूसरा विवाह करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। फिर सभी पितृगण दुखी होकर यमराज के पास जाते हैं, और उनसे विनती करते हुए कहते हैं, धर्मराज कृपया हमारे कुल की रक्षा कीजिए, हमारे पुत्र की कोई संतान नहीं है।और संतान के बिना हमारा कुल नष्ट हो जाएगा। कृपया आप हमारे पुत्र को दूसरा विवाह करने की आज्ञा दें। फिर यमराज कहते हैं, हे महात्माओं, मै अवश्य ही तुम्हारे पुत्र को समझाऊंगा, और उसे पुत्र प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करूंगा। ऐसा कहकर यमराज पृथ्वीलोक पर आते हैं, और एक साधू का रूप धारण करके, महाराज धर्मपाल के दरबार में जाते हैं। उन साधुओं को देखकर, महाराज धर्मपाल अत्यंत प्रसन्न होते हैं, और उनका आदर सत्कार करते हैं। फिर उनसे पूछते हैं, हे महात्मा, आप कौन हैं, किस प्रयोजन से आप हमारे इस राज्य में पधारे हैं। आपके मुख मंडल का तेज देखकर यह प्रतीत होता है, कि आप अवश्य ही कोई बड़े तपस्वी है। तब वह साधू उस राजा से कहते हैं, मैं साक्षात यमराज हूँ, तुम्हारे पूर्वजों के द्वारा प्रार्थना करने पर ही, मैं स्वयम तुमसे मिलने के लिए आया हूं। वह साधु महाराज से कहते हैं, हे वत्स, तुमने अपने पूर्वजों को दुखी कर दिया है, जिससे तुम्हारा सारा साम्राज्य नष्ट हो जाएगा। पुत्र के बिना तुम्हारी दुर्गति हो जायेगी, तुम्हें कभी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। शास्त्र कहते हैं, कि मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति के लिए, पुत्र को जन्म अवश्य देना चाहिए। फिर महाराज कहते हैं, हे धर्मराज, मैं विवश हु, मैं दूसरा विवाह करके पाप का भागीदार नहीं बनना चाहता। इससे अच्छा है कि मैं पुत्रहीन होकर, जीवन व्यथित करलूंगा। यमराज कहते हैं, तुम्हारे न्याय प्रिय आचरण से, और अपनी पत्नी के प्रति एकनिष्ठता को देखकर, मैं अत्यंत प्रसन्न हु। किन्तु हे धर्मपाल, एक मनुष्य दूसरा विवाह अवश्य कर सकता है, इसमें कोई पाप नहीं है। यदि किसी पुरुष की पत्नी उसके दूसरे विवाह के लिए सहमति दे देती है, तो वह पुरुष दूसरा विवाह निश्चित ही कर सकता है। इसमें कोई पाप नहीं है, शास्त्र कहते हैं, कि यदि एक पत्नी से पुत्र की प्राप्ति नहीं होती है, और उसकी पत्नी उसे दूसरा विवाह करने की अनुमति देती है, तो उसे दूसरा विवाह करने में संकोच नहीं करना चाहिए। साक्षात धर्मराज के द्वारा ऐसे वचन सुनकर, महाराज अति प्रसन्न हो जाते हैं, और यमराज को धन्यवाद देते हैं। फिर यमराज उस स्थान से अंतर्ध्यान हो जाते हैं। महाराज धर्मपाल अपनी पत्नी सुकन्या के पास जाते हैं, और उससे दूसरा विवाह करने की अनुमति मांगते हैं। तो महारानी सुकन्या उन्हें दूसरा विवाह करने की अनुमति दे देती है। तब महाराज दूसरी स्त्री से विवाह कर लेते हैं, जिससे उन्हें सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। और उधर स्वर्ग लोक में सभी पूर्वज भी आनंदित हो जाते हैं, और यमराज का बार बार धन्यवाद करते हैं। तो दर्शको, इस प्रकार से धर्मराज ने नारद जी को स्त्री और पुरुष के विवाह और आचरण संबंधी महत्वपूर्ण ज्ञान दिया है। तो दोस्तों उम्मिद करता हू की, आपको video पसंद आया होगा। और आप हमारे channel पर नये हो तो, video को like, और channel को subscribe जरूर करे। आपके एक लाईक से ही हमे प्रेरणा मिलती है, और हम मोटिवेट होते है। धन्यवाद।

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